"Na Jane kyu"
शाम ढलते ही,
शाम ढलते ही,
तन्हाई बढ़ती है,
एक चुप्पी-सी होंठो पे चढ़ती है,
फिर तुम्हारी याद,
दिल के कमरों से निकलती है,
आखों तक आते ही, पीघल जाती है.
न जाने क्यों ये शामे आती है ?
अँधेरा छा जाता है, राते आती है,
आख़े बंद कर मैं तुम्हारे ख़यालों में खोती हूँ;
और न जाने कब सपनो की दुनीया में कदम रख दिया करती हूँ I
वहाँ मैं तुम्हे ही ढूँढा करती हूँ ,
तुम्हारी झलक के लिए तरस जाया करती हूँ,
फिर तुम्हारी परछाई देख डर के छुप जाया करती हूँ,
न जाने क्यों सपनों में भी नादानियां करती हूँ ,
न जाने क्यों ये राते आती है ?
सुबह होते ही, आख खुलती है,
चिड़िया आ मेरे खिड़की पे चेहेक्ती है ,
ऐसा लगता है मुझे वोह छेड़ा करती है ,
कभी तुम्हारा तो कभी मेरा नाम पुकारा करती है ,
न जाने क्यों ये सुबह होती है ?
दिन भर तुम्हे ही मैं ढूँढा करती हूँ ,
कही तो नजर आ जाओगे यही सोचा करती हूँ ,
फिर भी नज़र जब तुम नहीं आते हो ,
आख़े बंद कर, पल्खों में छिपी तुम्हारी तस्वीर देख लिया करती हूँ I
न जाने क्यों, ये दिन काटने पड़ते है I
न जाने क्यों बिन तुम्हारे जीना पड़ता है ?
न जाने क्यों ?
न जाने क्यों ?
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